नर सेवा ही नारायण सेवा है
कहा गया है कि मंदिर में चढ़ाए गए फूल और प्रार्थनाएं तब तक अधूरी हैं जब तक कि मंदिर की सीढ़ियों पर बैठा कोई भूखा या ठंड से कांपता हुआ इंसान आपकी मदद का इंतजार कर रहा हो। मानव जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम किसी दूसरे के आंसुओं को पोंछ सकें और समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन में थोड़ी सी राहत और खुशी ला सकें।
सर्दियों की रातें और बेसहारा इंसानों की मूक वेदना
दिसंबर और जनवरी के महीनों में जब पारा 4 से 6 डिग्री तक गिर जाता है, तब हम अपने घरों में हीटर और रजाइयों के बीच भी ठंड महसूस करते हैं। जरा सोचिए उन असहाय बुजुर्गों, दिव्यांगों, फुटपाथ पर सोने वाले मजदूरों और झुग्गी-झोपड़ियों के नन्हे बच्चों का क्या हाल होता होगा जिनके पास तन ढकने के लिए एक अदद फटा हुआ कपड़ा भी नहीं होता। हर साल कड़ाके की ठंड की चपेट में आकर कई निर्धन अपनी जान गंवा देते हैं।
संस्था की रात्रिकालीन सेवा टीम और वितरण अभियान
माया बाई लोधी फाउंडेशन के समर्पित स्वयंसेवक कड़ाके की ठंड में रात 11 बजे से 3 बजे तक सड़कों, रेलवे स्टेशनों, रैन बसेरों और झुग्गियों का दौरा करते हैं। इस सेवा अभियान के तहत:
- 500 से अधिक जरूरतमंद परिवारों को उच्च गुणवत्ता के मोटे ऊनी कंबल प्रदान किए गए हैं।
- नन्हे बच्चों को गर्म स्वेटर, ऊनी टोपियां और मोजे वितरित किए गए हैं।
- जरूरतमंद असहायों को गर्म पौष्टिक भोजन और सूखा राशन किट (आटा, दाल, तेल, मसाले) पहुंचाई गई है।
"जब एक कांपते हुए वृद्ध दादा या दादी के ऊपर आप कंबल ओढ़ाते हैं और उनकी आंखों से जो आशीष के आंसू बहते हैं, वह दुनिया के किसी भी खजाने से अधिक मूल्यवान होते हैं।"